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Wednesday, August 23rd, 2017
मंत्री बनने के बाद नहीं रह जाता सामान्य नागरिक की तरह बोलने की आजादी का अधिकार : सुप्रीम कोर्ट

मंत्री बनने के बाद नहीं रह जाता सामान्य नागरिक की तरह बोलने की आजादी का अधिकार : सुप्रीम कोर्ट

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by April 20, 2017 India

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति मंत्री पद को स्वीकार करता है तो वो सामान्य नागरिक के बोलने की आजादी के अधिकार का उस तरह इस्तेमाल नहीं कर सकता. ना ही वो सरकारी पोलिसी के खिलाफ कोई बयान दे सकता है.

महिलाओं से रेप और अन्य अपराधों के मामले में ओहदे पर बैठे शख्स द्वारा बयानबाजी का मामला संविधान पीठ को भेजा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में संकेत दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस फली नरीमन और हरीश साल्वे को एक हफ्ते में कानून संबंधी तमाम दस्तावेज देने को कहा. मामले की अगली सुनवाई 2 मई को है.

बुलंदशहर में मां-बेटी के साथ गैंगरेप मामले में सुप्रीम कोर्ट अहम सुनवाई कर रहा है. पिछली सुनवाई में महिलाओं से रेप के मामले में ओहदे पर बैठे शख्स द्वारा बयानबाजी पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़े संवैधानिक सवाल उठाए थे कि

देश के संविधान ने महिलाओं को समान अधिकार, अलग पहचान और गरिमापूर्व जीवन जीने के अधिकार दिए हैं.
ऐसे में किसी रेप पीड़ित महिला के खिलाफ ओहदे पर बैठे व्यक्ति की बयानबाजी क्या महिला के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार को ठेस नहीं पहुंचाती.
क्या रेप जैसे गंभीर अपराध को पब्लिक आफिस में बैठा व्यक्ति राजनीतिक साजिश करार दे सकता है?
क्या से पीड़िता महिला के संविधान के दिए फ्री एंड फेयर ट्रायल का हनन नहीं क्योंकि इससे जांच प्रभावित हो सकती है.
संविधान द्वारा दिया गया कोई भी मौलिक अधिकार संपूर्ण नहीं क्योंकि ये कानून नियंत्रित है.
ऐसे में कोई भी शख्स ये नहीं कह सकता है रेप जैसे मामलों में ऐसी बयानबाजी बोलने के अधिकार के मौलिक अधिकार के दायरे में आता है.
यहां मामला सिर्फ किसी की बोलने की आजादी का अधिकार का नहीं बल्कि पीडिता के कानून के समक्ष समान संरक्षण और फ्री एंड फेयर ट्रायल के अधिकार का भी है.
अगर आरोपी ये कहता है कि उसे साजिश के तहत फंसाया गया तो बात दूसरी है लेकिन कोई डीजीपी कहता है कि पीड़िता झूठी है तो पुलिस मामले की क्या जांच करेगी?
यहां सवाल ये है कि ओहदे पर बैठे व्यक्ति के इस तरह बयानबाजी भले ही कोई अपराध के दायरे में ना हो लेकिन वो संविधान में दिए गए नैतिकता और शिष्टाचार के दायरे में भी आता है.

वहीं, केंद्र सरकार की ओर से इसका विरोध किया गया. AG मुकुल रोहतगी ने कहा इसे लेकर कोई कानून नहीं है. इस तरह कोर्ट मोरल कोड ऑफ कंडक्ट नहीं बना सकता. हालांकि कोई इस तरह की बयानबाजी करता है तो ट्रायल कोर्ट उसपर अवमानना की कारवाई कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फली नरीमन के साथ साथ हरीश साल्वे को भी कोर्ट की सहयोग करने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट बुलंदशहर गैंगरेप मामले की सुनवाई कर रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने मां-बेटी से गैंगरेप के मामले की जांच कर रही सीबीआई को जल्द जांच पूरी करने को कहा था. वहीं पिछले 15 दिसंबर कोबुलंदशहर गैंगरेप मामले में यूपी के मंत्री आजम खान के पछतावे वाले माफीनामे को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था. माफीनामे में रिमोर्स यानि पछतावा शब्द का इस्तेमाल किया गया था. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये बिना शर्त माफीनामा से भी ऊपर का माफीनामा है. उसके पहले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामा को सुप्रीम कोर्ट ने बिना शर्त माफीनामा स्वीकार करने से इनकार कर दिया था.

कोर्ट ने आजम खान को निर्देश दिया था कि वे नया हलफनामा दायर करें. आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद आजम खान सुप्रीम कोर्ट में अपने बयान को लेकर बिना शर्त माफी मांगने को तैयार हुए थे. इस मामले में एमिकस क्युरी फाली एस नरीमन ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को उन मंत्रियों के व्यवहार और कर्तव्यों पर एक दिशानिर्देश जारी करना चाहिए जो किसी भी तरह का सार्वजनिक बयान दे देते हैं. यूपी के बुलंदशहर में मां-बेटी से गैंगरेप मामले में पीडिता परिवार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है. इस गैंग रेप के मामले में यूपी के मंत्री आजम खान ने कथित रूप से ये बयान दिया था कि ये एक राजनीतिक साजिश थी.

जब आजम खान को सुप्रीम कोर्ट ने तलब किया था तो आजम खान ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि उन्होंने यह बयान नहीं दिया था कि गैंगरेप के पीछे राजनीतिक साजिश है.

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